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सिवाना डायरीज - 15

 सिवाना_डायरीज  - 15 'गौतम! फिर बोलो तो, क्या कहा आपने?' लम्बी और हल्की नीली धारियों वाला कुर्ता पहने एक सज्जन से दिखने वाले महानुभाव एक छोटे बच्चे से पूछ रहे थे। 'कुच नहीं तर, वो धलिमा के तिफिन ता तलर पिंत है। इचलिये मैं उते बोल लहा था ति पिंत तलर लड़तियों ता होता है।' तुतलाता सा जवाब था उस बच्चे का। 'अच्छा, किसने बताया ये आपको गौतम?' उसके पास एक घुटने पर बैठते हुये उन सज्जन ने पूछा। 'मेली दीदी बोल लही थी तर। उनतो बी बोत पतंद है पिंत तलर।' बहुत मासूमियत भरा जवाब था गौतम का। 'बेटा, पर मेरी पानी की बाॅटल में भी पिंक ढक्कन है, राहुल सर के बैग का भी और अखिल सर तो आज शर्ट भी पिंक कलर की पहने हैं। फिर हम सब भी लड़कियाँ हो गई ना?' ये तीसरा और सोचने को मजबूर कर देने वाला प्रश्न था उन सज्जन का। 'नहीं, तर। मधर पिंत तलर लड़तियों ता ही तो होता है!' जैसा जाना था अब तक, गौतम उसी पर अड़ा रहा। 'नही गौतम, कोई सा भी रंग किसी एक का नहीं होता। प्रकृति ने जीवन को खूबसूरत बनाये रखने के लिए ही हमें सारे रंग दिये हैं' उन सज्जन ने बहुत सज्जनता से ये बात ...

सिवाना डायरीज - 14

 सिवाना_डायरीज  - 14 सिवाना-बालोतरा रोड़ पर गुमटी जैसी एक छोटी सी मंदरी के बाहर अपने पैरों के छालों पर कपड़ों की कतरनें लपेटती उस देहाती सी दिखने वाली महिला के चेहरे पर थकान है। छालों पर कपड़े बांध वह फिर से चलने लगी डामर की सड़क पर। अपने फेटे को घुटने तक उठा हाथ में पकड़कर वह दौड़ना चाहती है क्योंकि उसके साथ वाले लोग आगे बढ़ चुके हैं। गुजरती बसों और मोदर-साइकिलों में से कहीं से भी जैसे ही 'जय बाबा री' आवाज आ जाती है तो वह दुगुनी आवाज में चिल्लाती है - 'जय बाबा री सा।' लगभग आधा-एक किलोमीटर दूरी पर एक पेड़ के नीचे पिकअप खड़ी है। उसकी ट्रोली में बेतरतीब से भरे पड़े हैं कितने ही बेग्स। पीछे ही पीछे दो बड़े स्पीकर रखे हैं जिन पर भजन चल रहा है - 'हे रुणीचे रा धणिया,  अजमाल जी रा कंवरा, माता मेणादें रा लाल, राणी नेतल रा भरतार, म्हारो हेलो, सुणो नी रामा पीर जी, ओ जी...' भजन की धुन ऐसी है कि राह चलता भी थिरक ले इस साज पर। मगर हिम्मत नहीं हो रही शायद उन सबकी जिनके लिए ये बजाया जा रहा है। नीम के चबूतरे के चारो तरफ लेटे-बैठे वो लोग अपने-अपने ढंग से सुस्ता रहे हैं। एक स्टाॅ...

सिवाना डायरीज - 13

 सिवाना_डायरीज  - 13 'कई परिवारों का इतिहास गवाह है कि औलाद की मार ने कई बड़े फौलादों को भी जमीन की धूल चटवा दी।' -पंडित विजयशंकर मेहता जी 'हमें सबसे ज्यादा काम करने की जिन पर जरूरत है, वो है हमारे बच्चे। ये कोठी, बंगले, गाड़ियाँ और जमींदारा दुनिया को दिखाने के लिए ठीक है। बाकि मन जो देखना चाहता है हमारा वो है हमारी सभ्य संतानें।' -आईपीएस प्रेमसुख डेलू जी पहले भी लिखा है मैंने एक कि, 'अगर आपके पिता आपसे खुश नहीं हैं, तो आप कैसे सोच सकते हैं कि वो परमपिता आपसे खुश होंगे।' -आईएएस जितेंद्र कुमार सोनी जी -इतने सच्चे और अच्छे क्वोट्स टाईप करने से पहले बार-बार सोच रहा हूँ कि क्या लायक हूँ मैं इतनी ढंग की बातें कर लेने के! आपके जीवन की चिंता करके पापा को अगर रात-भर अगर नींद न आये, तो समझ लेना चाहिए कि कुछ तो है जो आपको ठीक करने की जरूरत है। आप रो लीजिए उनके सामने, उनका सारा गुस्सा काफूर हो जायेगा। या तो वे साथ रो लेंगे या गले लगाकर खुद के रोने को दबाये आपको चुप करेंगे। पिता ठेठ देहाती हो या साॅ-काल्ड प्रगतिशील किस्म के। दिल सबका पापा वाला ही होता है। अट्ठाइस-तीस की उम्...

सिवाना डायरीज - 12

 सिवाना_डायरीज  - 12 1750 के दशक के आस-पास पहली बार ब्रिटिश जब भारत आये थे, विश्व के कुल उत्पादन में भारत का योगदान 24.4 प्रतिशत था और खुद ब्रिटेन का महज 1.9 प्रतिशत। 200 सालों में हमारे हाथों से हथकरघा और हल छीन अपनी मशीनों के ऑपरेटर बना उन्होंने हमारी ये हालत कर दी कि देश के आजाद होते वक्त विश्व के उत्पादन में ब्रिटेन का योगदान 17.4  प्रतिशत हो गया और भारत का रह गया 1.7 प्रतिशत।  अगस्त-सितंबर माह की इंडिया टूडे का एक आर्टिकल जब पढ़ रहा था, उसके उपर्युक्त आँकड़ों से मेरा खून अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ कतई नहीं खोला। उलट मुझे तरस आया कि हम कितना जल्दी तैयार हो गए ना मालिक से नौकर बनने के लिए। हम कितनी जल्दी तैयार हो गए काम की जिम्मेदारी नहीं लेने के लिए। हम तैयार हो गए मेवाड़ी कहावत 'बाण्या की नौकरी की होड नी वेवे' वाली हमें पीछे धकेल देने वाली व्यवस्था को स्वीकारने के लिए। हमनें संतुष्ट कर लिया खुद को सुबह-शाम की रोटी की व्यवस्था करके। हमनें सो काल्ड सभ्य और ऊँचा दिखने के लिए अपने खेतों में उगे, अपने हाथों से बुने कपड़ों पर स्वीकार कर लिया 'मेड इन इंग्लेंड' का टेग। ...

सिवाना डायरीज - 11

 सिवाना_डायरीज  - 11 दृश्य - १ भगवान ने कहा - 'हे आनंद, यह स्थान बौद्ध भिक्षुओं का प्रथम विहार होगा। बौद्ध भिक्षु यहाँ रहकर सन्मार्ग का अन्वेषण करेंगे। यही तथागत की इच्छा है।' दृश्य -२ एक वृक्ष की जड़ में अम्बपालिका स्थिर बैठी थी। भगवान को स्थित देख वह उठी और धीर भाव से प्रभु के सम्मुख आकर खड़ी हुई। भगवान ने उसकी ओर देखा। अम्बपालिका ने विनयावनत होकर कहा- 'बुद्धं शरणं गच्छामि।  धम्मं शरणं गच्छामि। संघं शरणं गच्छामि।।' तथागत स्थिर हुए। उन्होंने तत्काल पवित्र जल उसके मस्तक पर सिंचन किया और पवित्र वाक्यों का उपदेश देकर कहा - 'भिक्षुओं! महासाध्वी अम्बपालिका का स्वागत करो।' फिर जयनाद से दिशाएँ गूंज उठी और अम्बपालिका तथागत तथा अन्य भिक्षुगण को प्रणाम कर वहाँ से चल दी और फिर वैशाली के पुरुष उसे न देख सके... पहले दृश्य का वह स्थान जिसे तथागत भविष्य के लिए सन्मार्ग के अन्वेषण का केंद्र बता रहे हैं, वह एक वेश्यालय है और दूसरे दृश्य की अम्बपालिका नगर-वधू। आचार्य चतुरसेन की प्रिय कहानियों में से एक 'अम्बपालिका' को आज जब पढ़ा, तो महसूस हुआ कि जिंदगी हमारी सोच के परे ख...

सिवाना डायरीज - 10

 सिवाना_डायरीज  - 10 'इन्नीक निन्ने इश्तामानु'  ' हाँ, मलयालम में ऐसे कहा जाता है प्रेम की अभिव्यक्ति को।  नमस्ते रोहित जी। टीनएज रोमेंस या यूँ कहूँ लड़कपन की शैतानियाँ मैंने भी की है। खूब की है। मगर प्यार, इश्क, मोहब्बत, प्रेम या प्रणयम। हाँ 'प्रणयम' कहते हैं मलयालम में प्रेम को। वो है ना थोड़ा मैच्योर हो जाने के बाद ही समझ आता है। क्रिकेटर संजू सैमसन का बैचमेट रहा है मनु। ढेरों कहानियाँ हैं उसके पास। हैदराबाद यूनिवर्सिटी मेरे जीवन को यूँ बदल देगी। कभी सोचा न था। क्यों हुआ, क्या हुआ, कैसे बढ़ा? - ये सारे प्रश्न और इनके उत्तर जल्दी ही मिलेंगे आपको। थोड़ा पेशेंस रखिये...' सुबह-सुबह ही इतना कहकर पहला एपिसोड खत्म किया उसने। फिर जैसे-जैसे दिन ढलता गया, उसकी ऑडियो रिकाॅर्डिंग्स आती गई और शाम होते-होते एक लम्बी सी कहानी मिल गई मुझे भी लिखने के लिए।  तमिल, उड़िया, मलयालम, अंग्रेजी और हिंदी भाषा की मिक्स-वेज सब्जी जैसी है वो। हाँ मिक्स-वेज, मिक्स-वेज इसलिए कि मूलतः तमिलनाडू की होकर भी प्योर वेजिटेरियन है। बहुत ही प्यारी और चुलबुल एक दोस्त जिसने प्रेम की अपनी परिभाषाओं क...

सिवाना डायरीज - 9

 सिवाना_डायरीज - 9 'History is the one weak point in Indian Literature. it is in fact non existent. The total lack of historical sense is so characteristics that the whole course of Sanskrit literature is darkened by the shadow of this defect, suffering as it does from an entire absence of Chronology.' - कोई पाश्चात्य प्राच्यविद्या विशारद हमारे देश के बारे में यूँ कह देता है तो, एक बार तो अनडाइजेस्टेबल हो जाता है हमारे लिए। हम सोचते हैं कि क्या ठेठ पन्द्रहवी शताब्दी में कालीकट में कदम रखने वाले युरोपियन बतायेंगे हमें हमारा इतिहास! उनके यहाँ मिट्टी में प्राण-तत्व था या नहीं था, असंख्य सभ्यताएं पनप गई थी तब भारत में। मगर मेकडाॅलन ने कुछ गलत कहा है क्या इस पंक्ति में? हाँ, केवल कालक्रम को ही सारी ऐतिहासिक समझ मान लेने में उनका भी दोष है, मगर हमें ये तो स्वीकारना ही चाहिए ना कि कालक्रम वाला दोष जो न होता अगर हमारे इतिहास लेखन में, तो साहस हो पाता किसी बाहरी का ऐसी बात कह देने का! तभी तो ग्रंथ 'वीर-विनोद' के रचयिता हमारे राजपुताने के बेटे महोपाध्याय कविराज श्यामलदास ने भी अप...